सफलता की कहानी – बकरी पालने वाले की सफलता की कहानी

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सफलता की कहानी - बकरी पालने वाले की सफलता की कहानी
सफलता की कहानी

सफलता की कहानी

बकरी पालने वाले की सफलता की कहानी

किसी गाँव में चरनसिंह नाम का एक आदमी रहता था। उसके पास दो बकरियाँ थीं। उसी गाँव में गनेशी नाम का एक गरीब आदमी भी रहता था उसके पास एक बहुत सुन्दर बकरी थी। चरनसिंह की नजर उसकी बकरी पर थी। वह किसी तरह से उसकी बकरी को हड़पना चाहता था। इसी नीयत से उसने गनेशी से अपनी बकरी देने को कहा। मगर गरनेशी ने मना कर दिया।

एक दिन-रात के समय गनेशी की बकरी चरनसिंह के खेत में घुस गयी। चरनसिंह ने जब यह देखा तो उसने बकरी को पकड़कर अपने घर में बाँध लिया और सबसे कहा कि “यह बकरी मेरी है।” गनेशी अपनी बकरी को ढूँढ़ते हुए जब चरनसिंह के घर पहुँचा तो उसने अपनी बकरी को देखते ही पहचान लिया। मगर चरनसिंह ने गनेशी को उसकी बकरी लौटाने से इंकार कर दिया।

गनेशी ने गाँव के कई लोगों से चरनसिंह की शिकायत की कि उसने जबर्दस्ती उसकी बकरी को अपनी बना लिया है। मगर चरनसिंह बहुत ही झगड़ालू और धनी आदमी था। उसके खिलाफ बोलने का किसी में साहस न था। सब गाँववालों ने चरनसिंह का ही साथ दिया।

सफलता की कहानी इन हिंदी

जब गनेशी ने ईश्वर की कसम खाकर बकरी को अपनी बताया, तब अन्त में प्रधान ने अपना फैसला सुनाया, “बकरी किसकी हैं, यह फैसला बकरी को ही करने दिया जाये। ” प्रधान के कहने पर चरनसिंह के घर से बकरी मंगायी गयी और उसे सबके सामने खड़ा कर दिया। बकरी के एक तरफ चरनसिंह को खड़ा किया गया और दूसरी ओर गनेशी को। प्रधान ने चरनसिंह को कहा कि वह बकरी को अपने पास बुलाये। चरनसिंह ने बकरी को आवाज देकर अपने पास बुलाया, लेकिन बकरी टस-से मस नहीं हुई।

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इसके बाद जब गनेशी ने अपनी बकरी को आवाज दी तो वह लपककर उसके पास पहुँच गयी। प्रधान ने कहा, “आज सबके सामने यह फैसला बकरी ने ही कर दिया है कि वह गनेशी की बकरी है।” चरनसिंह का सिर सबके सामने शर्म से झुक गया और गनेशी अपनी बकरी को लेकर खुशी-खुशी अपने घर चला गया।

चरनसिंह सबके सामने तो मुँह से कुछ नहीं बोल पाया था पर वह अपनी बेइज्जती का बदला लेना चाहता था। एक दिन उसने गनेशी को रास्ते में रोककर कहा, “मैं इस बकरी को तेरे पास नहीं रहने देँगा। यह मेरी नहीं रही तो तेरी भी नहीं रहेगी। मैं इसे मार डालूँगा ।” गनेशी अपनी बकरी को बड़ी हिफाजत से रखने लगा। वह कभी उसे अकेला नहीं छोड़ता था। वह जानता था कि चरनसिंह मौका मिलते ही उसकी बकरी का काम तमाम कर देगा।

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बकरी पालने वाले की कहानी इन हिंदी

बकरी को मारने का कोई उपयुक्त मौका न मिलते देख चरनसिंह और अधिक ईर्ष्यालु हो गया था। एक दिन उसे पता लगा कि गनेशी रात में किसी काम से पास के गाँव जाएगा। उसने सोचा- “बस यही मौका है, जब वह इस बकरी को मार सकता है।” गनेशी इसी चिन्ता में था कि वह आज रात बकरी को कहाँ रखे कि वह चरनसिंह के हाथ न लगे। अचानक उसे एक तरकीब सूझी।

रात का हल्का-सा अँधेरा होते ही गनेशी ने अपनी बकरी को अपने साथ लिया और उसे लेकर चरनसिंह की बकरी के स्थान पर बाँध आया। इसके अलावा वह चरनसिंह की बकरी को खोलकर अपने घर पर बाँध आया। अँधेरा बढ़ने के बाद वह अपने काम से पास के गाँव को चला गया।

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देर रात को मौका देखकर चरनसिंह अपने हाथ में विष मिले आटे की गोलिय्राँ लेकर गरनेशी की बकरी को खिलाने चल पड़ा। चोरों की तरह वह गनेशी के घर में घुसा। उसने देखा कि बकरी एक कोने में बैठी जुगाली कर रही है। अँधेरे में वह बकरी को पहचान नहीं पाया और उसने वह आटा अपने हाथों से बकरी को खिला दिया।

बकरी पालने वाले की सफलता

अगले दिन सबेरे-सबेरे उसने गनेशी के घर के सामने जमा हुए लोगों की भीड़ देखी तो वह समझा कि गनेशी की बकरी मर गयी। मगर जब उसने गुनेशी के घर पर जाकर देखा तो अपनी बकरी को मरा हुआ देखकर सन्न रह गया। गनेशी की बकरी तो सकुशल खड़ी थी।

रात की बकरियों के अदल-बदल करने की बात गनेशी ने सभी गाँव वालों को बता दी थी। गाँव वालों ने गनेशी का साथ दिया और चरनसिंह का मजाक बना लिया। चरनसिंह अपने किये पर पछता रहा था और सिर धुन रहा था कि उसने गनेशी के लिए जो कुआँ खोदा था, उसमें खुद ही गिर पड़ा था।

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