Very Short Moral Story : अमूल्य उपहार – हिन्दी कहानी

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अमूल्य उपहार - हिन्दी कहानी

Very Short Moral Story

Very Short Moral Story : अमूल्य उपहार – हिन्दी कहानी

चन्द्रगढ़ी रेलवे स्टेशन के पास चन्द्रपुर नामक गाँव के पंचायत घर में रिटायर्ड फौजी हरि दादा ने एक व्यायामशाला खोल रखी थी। वहीं पर वे अपने पोते गोपाल के साथ रहते थे। दो वर्ष पहले गोपाल के माता-पिता का शहर जाते समय रेल दुर्घटना में देहान्त हो गया था। गोपाल पास के गाँव के विद्यालय में सातवीं कक्षा में पढ़ता था। वह बहुत निडर और वीर स्काउट था। उसके दादा जी उसे हमेशा वीरों की कहानियाँ सुनाया करते थे। हर महीने दादा जी शहर पेन्शन लेने जाते तो गोपाल घर पर अकेला ही रहता था। तब उसे अपने माता-पिता बहुत याद आते थे।

गोपाल का एक सफेद बालोंवाला प्यारा-प्यारा झबरू कुता था, जिसे वह बहुत प्यार करता था। वह हमेशा उसके साथ-साथ रहता था। पंचायत घर के पास एक पुराने शिवमन्दिर के खण्डहर थे। मन्दिर से कुछ दूर रेल की पटरी बिछी थी, जो शहर को जाती थी। मन्दिर से सटे हुए कई छायादार पेड़ थे। उनमें सबसे पुराना और बूढा बरगद का एक पेड़ था जिसके तने में भारी कोटर बना हुआ था। पेड़ पर रंग-बिरंगे तरह-तरह के सुन्दर-सुन्दर पक्षी रहते थे । उनके बच्चों से उसकी गहरी मित्रता थी। उनके साथ खेलता हुआ वह बरगद के कोटर में छिप जाया करता था। जन्म से ही पक्षियों के साथ-साथ खेलने से वह उनकी बातें खूब समझ-बोल लिया करता था।

अमूल्य उपहार – हिन्दी कहानी – Very Short Moral Story

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चिड़ियाँ और उनके बच्चे उसे प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। आज जब दादा जी शहर गये तो गपाल पुनः अपने झबरू के साथ पक्षियों से खेलने लगा। आज उसका घर लौटने का मन नहीं हुआ तो वह कोटर में घुसकर बैठ गया। बैठते ही उसे नींद आ गयी। झबरू भी तने से लगा धरती पर गोपाल के जागने के इन्तजार में ऊँबने लगा कि कब गोपू भैया जागे और यहाँ से चलें, ताकि घर जाकर वे दोनों रोटी खायें।

उसे बहुत जोर की भूख लगी थी किन्तु वह गोपू भैया के बिना धर कैसे जा सकता था। यूँ भी दादा जी घर पर नहीं थे और दरवाजे पर ताला लटक रहा था। अचानक उल्लू के बच्चे गैंजा के रोने की आवाज सुनकर गोपाल चौंका। गैंजा अपनी माँ से कुछ खाना देने की जिद कर रहा था। गोपाल को लगा, उसे भी भूख लगी है। भूख का ध्यान आते ही उसे झबरू की याद आयी।

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वह कोटर से कूदना ही चाहता था कि नर और मादा उल्लू की बात सुनकर हैरत में पड़ गया। वह बिना हिले-डुले उनकी तरफ कान लगाये बैठा रहा। उनका घोंसला कोटर से छूती शाखा पर ही टिका था। इस कारण गोपाल को उनकी बात स्पष्ट सुनायी दे रही थी। माटा उल्लू गैंजा को समझा रही थी, “बेटे! जो कुछ घर में था, तुम खा चुके हो, मैं और खाना कहाँ से लाऊं।” गैंजे को चुप न होता देख नर उल्लू ने समझाते हुए कहा, “अरे चुप भी हो जा, थोड़ी देर की बात है।

सब्र कर दावत खिलाऊँगा, दावत; जितना जी चाहे खाना उल्लू की बात सुनकर मादा उल्लू चिढ़कर बोली, “क्यों बेकार में झूठी बातों से बच्चे को बहकाते हो। मुझे तुम्हारी यह आदत बिलकुल पसंद नहीं।” नर उल्लू ने मजाक उड़ाते हुए जोर से हँसकर अपनी बात को फिर दोहराया तो मादा उल्लू चिढ़ गयी और खिसियाकर बोली, “थोड़ी देर बाद क्या मुरदों की बारिश होगी।

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नर उल्लू मादा की अधूरी बात में हामी भरता-सा कहने लगा, “अरी हाँ बारिश ही होगी। क्या तुझे कल रात की उन दो आदमियों की बात याद नहीं, जो आज रात मन्दिर वाली रेल की पटरी पर बम रखकर, गाड़ी उड़ाने की बात कर रहे थे? तब क्या एक मरेगा- अरी हजारों मरेगे, हजारों-हा-हा-हा” के अट्टहासों में उल्लू की बात खो गयी थी। गोपाल का सिर भन्ना गया। उसकी जीभ सुख गयी, आँखों के आगे अंधेरा-सा छा गया।

उसे दादा जी याद आने लगे, जो इसी गाड़ी से आने वाले थे दुःख के मारे उसके आँसू बहने लगे और साथ ही उसे अपने मम्मी-पापा भी याद आने लगे। उसे लगा आज फिर हजारों बच्चे उसकी तरह अनाथ हो जाएँगे। एक मिनट रोने के बाद उसकी बुद्धि स्थित हुई तो वह सोचने लगा कि इस तरह रोने-घोने से आपत्ति टाली नहीं जा सकती, उसे ही कुछ करना चाहिए। वैसे भी वह स्काउट है और लोगों की मदद करना उसका कर्तव्य है।

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गोपाल कोटर से नीचे उतर आया। झबरू उसके पैर चाटकर पूँछ हिलाते हुए बोला, “घर चलो, गोपू भैया, मुझे जोर की भूख लगी है।” गोपाल ने उसकी बात अनसुनी करके उसे उल्लू वाली बात बतायी। झबरू भी दादा जी के लिए चिन्तित होकर सहमा-सहमा-सा बोला, “अब क्या करोगे, गोपू भैया”। कुछ सोचते हुए गोपाल झबरू को अपनी योजना समझाने लगा। झबरू ने भी गर्दन हिलाकर हामी भर दी। अब वे दोनों तेज गति से स्टेशन की ओर भागे जा रहे थे। उन दोनों की ही भूख-प्यास भाग गयी थी सुनसान रास्ते का भी उन्हें कोई भय नहीं सता रहा था। चाँदनी रात थी। पूरा खिला चन्द्रमा भी उनके साथ-साथ उनके निर्जन रास्तों को चमकाता हुआ आकाश-मार्ग में तेज-तेज भाग रहा था। इक्के-दुक्के कुत्तों के अलावा उन्हें रास्ते में चिड़िया का बच्चा तक नहीं दिखाई दिया।

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आखिर स्टेशन आ गया। दोनों पसीने से लथपथ बुरी तरह हाँफ रहे थे। प्लेटफार्म पर भी अधिक भीड़ न थी। दो-चार आदमी बेंचों पर पड़े सो रहे थे और दस- पाँच अपने सामान को बगल में चिपकाये, वहीं धरती पर पसरे पड़े थे। गोपाल और झबरू स्टेशन मास्टर के कमरे के नजदीक आकर ठिठके। दरवाजा खुला था, कोई पहरेदार भी न था। गोपाल अन्दर घुस गया, उसके पीछे-पीछे झबरू भी घुस गया। गोपाल ने स्टेशन मास्टर को उल्लू वाली सारी बात बतायी, परन्तु उसने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया, वरन् उसे डाँटकर भगा दिया। अब गोपाल और झबरू परेशान थे कि क्या किया जाए। गाँव में न कोई थाना था, न छाबनी। समय भी नहीं था कि गाँव वाले इकटठे किये जाएँ। झबरू रोने लगा पर गोपाल मन-ही-मन कोई तरकीब ढूढ रहा था।

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अनायास ही उसे याद आया कि स्काउट मास्टर जी बताते थे कि यदि गाड़ी को बहुत दूर से लाल झण्डी दिखाई जाए तो वह रुक सकती है, क्योंकि हरी झण्डी गाड़ी के चलने का सिग्नल है और लाल झण्डी रुकने का आदेश, क्योंकि वह खतरे की आशंका प्रकट करता है। गोपाल उछलकर बोला, “यदि कहीं से लाल कपड़ा मिल जाए तो बात बन सकती है। झबरू ने गोपाल की बात तो पूरी नहीं समझी, लेकिन उसकी तरफ देखकर कहा, “गोपू भैया लाल तो तुम्हारी शर्ट ही है।

झबरू की बात सुनकर गोपाल ने दौड़ते हुए कहा, “जल्दी कर झबरू हमें मन्दिर से आगे तक जाना होगा।” दौड़ते-दौड़ते रास्ते में गोपाल ने झबरू को अपनी योजना समझा दी जब वह मन्दिर की पटरी से लगभग दो सौ गज आगे बढ़ गये तो रुक गये। गोपाल ने पास के पेड़ की एक लम्बी मजबूत डाली तोड़ी, उसके पते साफ किये और अपनी शर्ट निकाली।

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फिर झबरू के गले के पट्टे को निकालकर उसकी मदद से डण्डी पर मजबूती से शर्ट को बाँध दिया, जिससे वह हिलने से खिसके नहीं। फिर उसने अपनी बनियान निकाली, उस पर कुछ लिखा और झबरू के गले में बँधकर उसके कान में कुछ कहा। सुनकर झबरू रोने लगा वह कह रहा था यदि तेरा गोपू दुर्घटना का शिकार हो जाय तो यह बनियान रेलवे वालों को दिखा देना। इस पर उल्लू वाली बात लिखी है। अब दोनों पटरियों के बीच खड़ा गोपाल लाल झण्डी बनी डण्डी को हिलाने लगा। गोपाल का चेहरा साहस से दमक रहा था और झबरू का दिल उतना ही घड़क रहा था। वह मन-ही-मन भगवान से मंगल-कामना करने लगा।

नजदीक आती ‘छुक-छुक’ की और ऊँची-ऊँची ट्रेन की सीटियों की आवाजों से भी गोपाल विचलित नहीं हुआ। वह दूने वेग से झण्डी लहराता ही जा रहा था। आखिर गोपाल खुशी से चिल्लाया उसके कुछ गज दूर रेलगाड़ी आकर रुक गयी थी। उसने देखा कि बहुत सारे आदमी उसकी ओर दौड़े चले आ रहे थे। गोपाल की चहकती आवाज सुनकर भयभीत झबरू ने आँखें खोलकर देखा। वह भी खुशी से अपनी दुम हिला – हिलाक नाचने लगा। रेलवे पुलिस ने गोपाल को पकड़कर गाड़ी रुकवाने का कारण पूछा तो गोपाल ने उल्लू से सुनी बात को दोहर द

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उन्हें भी पहले गोपाल पर यकीन नहीं आया। वे उसे झूठा और पागल बच्चा समझकर डॉटने लगे। परन्तु गोपाल के बार-बार विनम्रतापूर्वक कहने पर उन्होंने अपने कुछ आदमियों को मन्दिर के पास जाँच के लिए भेज दिया। गोपाल के दादा जी भी अब तक गाड़ी से उतरकर वहाँ पहंच चुके थे। वे अधनंगे गोपाल को खड़ा देख घबरा गये। गोपाल दौड़कर उनसे लिपट गया और सिसक-सिसककर उनसे सारा हाल बताया। दादा जी ने रेलवे पुलिस को बताया कि गोShortपाल झूठा और पागल बच्चा नहीं है। वह अपने बड़ों से कभी मजाक नहीं करता। गोपाल की बातें सच हो सकती हैं, क्योंकि वह पक्षियों की बोली अच्छी तरह समझ भी सकता है और बोलता भी है। उन्होंने गोपाल से कपड़े पहनने को कहा।

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अब गोपाल को ख्याल आया कि वह अधनंगा खड़ा है तो वह जल्दी- जल्दी कपड़े पहनने लगा। कुछ देर बाद ही जाँच करने वाले पुलिस के आदमी लौट आये। उन्होंने गोपाल के कथन की पुष्टि की। बम बहुत ही विनाशकारी था। गोपाल प्रसन्नता से रो रहा था कि अब उसके दादा जी सकुशल थे। दादा जी भी गदगद होकर कभी गोपाल को चूमते, कभी छाती से चिपटाते। झबरू कभी दादा जी के पैर चाटता, कभी गोपाल के और कभी दुम हिलाकर भौंक – भौंककर भीड़ से कहता, “देखो, मेरा गोपू भैया कितना अच्छा है।” सभी ने गोपाल के साहस की सराहना की, क्योंकि उसके कारण ही उन्हें नया जीवन मिला था। गोपाल को नकद पुरस्कार मिला और वीर बालक की उपाधि भी। लेकिन गोपाल को जनसमूह का दिया गया आशीर्वाद ही सबसे अमूल्य उपहार लगा।

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